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माइटोकॉन्ड्रिया क्या है || what is mitochondria in Hindi

इस पोस्ट मे हम माइट्राकान्ड्रिया तथा उसकी संरचना के बारे में जानेंगे


माइट्राकान्ड्रिया
(Mitochondria)


माइट्रोकाण्ड्रिया (Gr; Mito = thread; chondrion = granule) यह एक महत्वपूर्ण कोशिकांग है जो बाह्य रूप से कणिकामय या तन्तुमय होता है। आधुनिक वैज्ञानिक इसे जीवरासायनिक मशीन कहते हैं क्योंकि यह भोजन के अवयवों में संचित स्थितिज ऊर्जा को गतिज ऊर्जा में परिवर्तित करता है। इसीलिए इसे सामान्य रूप से “कोशिका का ऊर्जा घर" (Power house of the cell) कहते हैं।

ऐतिहासिक
 (Historical) 
कोलिकर (Kolliker) ने 1880 में कीटो की पेशीय कोशिकाओं में कणिका के रूप में माइट्रोकॉण्ड्रिया को देखा बाद में फ्लेमिंग (Flemming) ने 1882 में इसे (Fila) कहा। अल्टमान (Altmann) ने 1894 में इस संरचना को आल्टमान की कणिकामय बायोब्लास्ट "Altmann's granules bioblasts" का नाम दिया। बेन्डा (Benda) ने 1897 में माइटोकान्ड्रिया का नाम दिया तथा वेलट (Velette) तथा जार्ज (George) ने माइटोकॉड्रिया को साइटोमाइक्रोसोम्स कहा। बेन्सले तथा हायेर (Bensley and Hoer) ने 1934 ने माइटोकॉन्ड्रिया के सर्वप्रथम यकृत कोशिकाओं से पृथक किया। जबकि हागबूम (Hogeboom) तथा अन्य वैज्ञानिकों ने 1948 में बताया कि माइटोकॉन्ड्रिया में कोशिकीय श्वसन होता है। नैस (Nass) ने 1963 में माइटोकॉन्ड्रिया में DNA अणुओं की उपस्थित को देखा। वारबर्ग (Warburg) ने 1913 मे देखा कि कोशाद्रवीय कणिकाओं में श्वसन एन्जाइम्स को देखा और बताया कि श्वसन एन्जाइम्स कोशातल्यीय कणिकाओं में श्वसन एन्जाइम्स को देखा और बताया कि श्वसन एन्जाइम्स कोशाद्रवीय कणिकाओं से सम्बन्धित होते हैं। कोशिका के सम्पूर्ण माइटोकान्ड्रियल समूह को कान्ड्रियोसोम्स (Chondriosomes) प्लास्टोकान्द्रिया (Plastochondria), प्लास्टोसोम्स (Plastosomes) माइटोकॉन्ड्रिया (Myochondria), प्लास्टोकान्टस (Plastoconts) तथा कान्द्रियोसोम्स (Chondriosomes) आदि कहते हैं।


वितरण या स्थिति 
(Distribution or Localization)

माइटोकॉन्ड्रिया समान रूप से साइटोप्लाज्म में वितरित होते हैं और साइटोप्लाज्म में स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ सकते हैं, लेकिन कुछ कोशिकाओं में उनका वितरण सीमित होता है। उदाहरण के लिए, रेटिना की शंक्वाकार कोशिकाओं में, माइटोकॉन्ड्रिया आंतरिक खंड में स्थित होते हैं, जबकि मांसपेशियों की कोशिकाओं में, माइटोकॉन्ड्रिया मायोफिब्रिल्स के बाहरी पट में केंद्रित होते हैं और एक रिंग बनाते हैं, जबकि वृक्क नलिकाओं में, माइटोकॉन्ड्रिया कोशिका झिल्ली के पास क्षैतिज रूप से स्थित होते हैं . हुह। इन कोशिकाओं में माइटोकॉन्ड्रिया की स्थिति अलग होती है क्योंकि सक्रिय चयापचय के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है।


मैल्जीपियन नलिकाओं की कोशिकाओं, अग्नाशयिक कोशिकाओं तथा पैरामीशियम में माइटोकॉन्ड्रिया परिधीय कोशाद्रव्य में स्थित होते हैं, जबकि कुछ कोशिकाओं में माइटोकॉन्ड्रिया केन्द्रक के चारों तरफ स्थित होते हैं। सूत्री तथा असूत्री कोशा विभाजन के समय माइटोकॉन्ड्रिया स्पिंडल के चारों तरफ केन्द्रित हो जाते हैं।

संरचना
 (Structure)

इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप की सहायता से देखने पर माइटोकॉन्ड्रिया की बाह्य संरचना थर्मस बोतल (Thermos bottle) के समान होती है। इसका बाह्य आकार दोहरी भित्ति से निर्मित होता है जो इसे स्थायित्व, लचीलापन तथा मजबूत बनाता है। इस स्तर को क्रमशः बाह्य तथा आन्तरिक माइटोकान्ड्रियल झिल्ली कहते हैं। आन्तरिक झिल्ली के अन्दर दो कक्ष होते हैं। इसके निम्न भाग होते हैं


चित्र : विल्लियों, कक्षों एवं क्रिस्टी के प्रदर्शन हेतु एक माइटोकाण्डूिओन का सेक्शन


(I) माइटोकॉन्ड्रियल झिल्लियाँ (Mitochondrial membranes) - बाह्य तथा आन्तरिक माइटोकान्ड्रियल झिल्लियाँ त्रिस्तरीय (Trilaminate) होती है।

1. बाझ माइटोकॉन्ड्रियल झिल्ली (Outer Mitochondrial membrane) - यह माइटोकॉन्द्रिय का बाह्य सतत् रक्षक आवरण बनाता है जो माइटोकॉन्ड्रियल तत्वों को कोशाद्रव्य (Cell-sap) से पृथक। करता है। एक विशेष स्थान पर यह एण्डोप्लामिक झिल्ली से जुड़ता है। बाह्य झिल्ली पारगम्य होती है जिसके कारण कोशाद्रव्य से विभिन्न प्रकार के उपापचयी तत्व माइटीकान्ड्रियल मैट्रिक्स में आ जाते


2. आन्तरिक माइटोकॉन्ड्रियल झिल्ली (Inner mitochondrial membrane)- यह आन्तरिक झिल्ली है जिसके बीच में एक रिक्त स्थान होता है जिसमें आन्तरिक रूप से उंगलियों के समान बहुत से उभार पाये जाते हैं। इन उँगली सदृश उभारों को माइटोकान्ड्रियल क्रेस्ट या क्रिस्टी कहते हैं। क्रस्टी केन्द्रीय रिक्त स्थान को आपसी सम्बन्धित कोष्ठकों में विभाजित करती है। आन्तरिक झिल्ली में दो सतह होती है जिन्हें क्रमशः बाह्य तथा आन्तरिक सतह (Outer and inner surface) कहते हैं।

(II) माइटोकॉन्द्रियल कोष्ठक (Mitochondrials Chambers) - माइटोकॉन्ड्रियल कोष्ठक दो प्रकार के होते हैं जिन्हें क्रमशः बाह्य तथा आन्तरिक कोष्ठक कहते हैं।

(i) बाहा कोष्ठक (Outer chamber) - यह माइटोकॉन्ड्रिया की बाह्य तथा आन्तरिक झिल्ली के बीच का रिक्त स्थान है।

(ii) आन्तरिक कोष्ठक (Inner chamber) - यह चौड़ा सा आन्तरिक रिक्त स्थान है जो आन्तरिक झिल्ली के अन्दर बन्द रहता है। जिसमें माइटोकॉन्ड्रियल मैट्रिक्स भरा रहता है।

(III) माइटोकॉन्ड्रियल क्रिस्टी (Mitochondrial Cristae)- माइटोकॉन्ड्रियल क्रिस्टी की व्यवस्था विभिन्न कोशिकाओं में निम्न प्रकार की होती है।

1. माइटोकॉन्ड्रिया की लम्बवत् अक्ष के समानान्तर क्रिस्टी व्यवस्थित होते हैं।
2. लम्बवत् अक्ष के क्षैतिज उर्ध्वाधर (Perpendicular) क्रम में लगे होते हैं।
3.अमीबा के विलाई (Villi) की तरह आपस में संयुक्त होकर विशेष रचना बनाते हैं।
4. क्रिस्टी येसीकल्स के रूप में होते हैं तथा आपस में मिलकर संयुक्त कोष्ठकों का जाल बनाते हैं, जैसा कि मनुष्य में श्वेत रक्त कणिकाओं की कोशिकाएँ होती हैं।

(v) हीपैटिक कोशिकाओं में समान असमान रूप से वितरित होते हैं।
(vi) नलिका रूप में व्यवस्थित होते हैं, लेकिन नलिकायें माइटोकान्ड्रियल अक्ष के उर्ध्वाधर स्थित  होती है।
(vii) क्रिस्टी बहुत ही सूक्ष्म तथा अनियमित क्रम में व्यवस्थित होते हैं।
(viii) कभी-कभी माइटोकॉन्ड्रियल भित्ति चिकनी होती है तथा उनमें क्रिस्टी नहीं पाये जाते हैं।

(IV) प्राथमिक कण या माइटोकॉन्ड्रियल कण (Elementary particles (or)F1 particles
(or) Mitochondrial particles)

इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप की सहायता से देखने पर स्पष्ट होता है कि माइटोकॉन्ड्रिया की आन्तरिक झिल्ली पर अत्यन्त सूक्ष्म टेनिस के रैकेट के समान रचनाएँ पायी जाती हैं जिन्हें प्राथमिक कण, F1 कण या माइटोकॉन्ड्रियल कण कहते हैं।

पारसन (Parson) 1963 ने F1 कणों को इलेक्ट्रान स्थानान्तरण कण (E.T.P.) कहा लेकिन बाद में रैकर (Racker) 1967 ने बताया कि F1 कणों (E.T.P.) में विशेष प्रकार के ATPase या AT.P.सिन्थेटेज एन्जाइम्स पाये जाते हैं जो आक्सीकरण तथा फास्फोराइलेशन की प्रक्रिया में भाग लेते हैं।

माइटोकॉन्ड्रिया में श्वसन श्रंखला या इलेक्ट्रान स्थानान्तरण तंत्र (The respiratory chain or Electron transport system in Mitochondria)- श्वसन श्रृंखला में काम्प्लेक्स प्रोटीन्स की एक लम्बी श्रृंखला होती है जो इलेक्ट्रान स्थानान्तरण तंत्र (ETS) में भाग लेती है। इनमें चार काम्प्लेक्स लाइपोप्रोटीन्स के द्वारा बनते हैं। इसके अतिरिक्त दो गतिशील इलेक्ट्रान वाहक (सह-एन्जाइम्स) होते हैं जिन्हें क्रमशः यूबीक्वीनोन (Ubiquinon ) (UQ) तथा साइटोक्रोम-C कहते हैं।

1. काम्प्लेक्सेज (Complex) - काम्पलेक्सेज वह स्थान है जहाँ पर कैब्स चक्र के समय हाइड्रोजन आयन्स मुक्त होते हैं तथा उनका आक्सीकरण होता है जिसके परिणामस्वरूप ऊर्जा मुक्त होती है। यह ऊन कोशिका में A.T.P, के रूप में संचित हो जाती है। काम्प्लेक्स मुख्य रूप से चार प्रकार के होते हैं।

(A) काम्प्लेक्स (I) - यह NADH के फ्लैवो प्रोटीन्स डी हाइड्रोजीनेज (FPN) से मिलकर बनते हैं। काम्प्लेक्स ।, फ्लैविन मोनो न्यूक्लियोटाइड (FMN) का प्रास्थैटिक समूह है। काम्प्लेक्स I, NADH से हाइड्रोजन आयनों को ग्रहण करता है तथा एक लौह विहीन तत्व (FeNHN) प्रोटीन्स के साथ संयुक्त होता है तथा फ्लैवो प्रोटीन्स के निर्माण में सहायक होता है।

(B) काम्लेक्स (II) - यह सक्सीनिक-डी हाइड्रोजिनेस से हाइड्रोजन आयनों को ग्रहण करता है। यह फ्लेविन एडनीन डाइ न्यूक्लियोटाइड (FAD) का प्रास्थैटिक समूह है। यह काही त्स सक्सनिक ही हाइड्रोजिनेज (FPS) के फ्लैवो प्रोटीन्स से मिलकर बनता है। जिसमें लौह विहीन आयरन (Non-
haeme iron) FeNHS, FPS के साथ संयुक्त होता है।

(C) काम्प्लेक्स (III)- यह साइटोक्रोम 6 तथा साइटोक्रोम C, से मिलकर बनता है। जिसमें लौह विहीन आयरन प्रोटीन (FeNHR) साइटोक्रोम 6 के साथ संयुक्त हो जाता है।

(D) काम्प्लेक्स (IV) - यह साइटोक्रोम a1 तथा साइटोक्रोम a3 के मिलने से बनता है।

2. सह एन्जाइम (Co-enzyme or Ubiquinone) - यह गतिशील इलेक्ट्रान वाहक जो  काम्प्लेक्स । तथा ।। से इलेक्ट्रान्स को काम्प्लेक्स में स्थानान्तरित करता है। सहएन्जाइम माइटोकॉन्द्रिया
में आक्सीकृत क्वीनोन अवस्था में पाया जाता है।

माइटोकॉन्ड्रिया के कार्य
(Functions of Mitochondria)

1. भोज्य अवयवों का आक्सीकरण (Oxidation of Food stuffs)- माइटोकॉन्ड्रिया कोशिका के अन्दर अनेक महत्वपूर्ण कार्य करते हैं जैसे आक्सीकरण, डी हाइड्रोजिनेशन, श्वसन क्रिया तथा आक्सीडेटिव फास्फोराइलेशन आदि। माइटोकॉन्ड्रिया में 75 से भी अधिक एन्जाइम्स पाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त अनेक सह-कारक (Co-factors) तथा धातुएँ भी होती हैं जो माइटोकान्ड्रिया के समस्त का को संचालित करती हैं। माइटोकॉन्ड्रिया को आक्सीजन के अतिरिक्त फास्फेट (PO,) तथा एडिनोसिन डाई फास्फेट (ADP) की ईंधन के रूप में आवश्यकता होती है जबकि प्रधान तथा अन्तिम उत्पाद A.T.P. कार्बनडाई आक्साइड CO, तथा 50 के रूप में होता है। माइटोकान्ड्रिया कोशिका का श्वसन अंग है जहाँ पर आक्सीकरण के परिणामस्वरूप भोजन के प्रमुख अवयव जैसे वता, कार्बोहाइड्रेट्स आदि का पूर्ण रूप से CO2 तथा H20 में आक्सीकरण हो जाता है और अधिक मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती है। यह ऊर्जा एडिनोसिन ट्राइफास्फेट (A.T.P.) के रूप में होती है क्योंकि माइटोकान्ड्रिया एडिनोसिन ट्राइफास्फेट (A.T.P.) के रूप में ऊर्जा का संश्लेषण करता है इसीलिए माइटोकान्ड्रिया को "कोशिका का ऊर्जा घर" (Power house of the cell) कहते हैं।

A.T.P. का निर्माण प्यूरीन बेस (एडिनीन), एक पेण्टोज शर्करा (राइबोस) तथा फास्फोरिक अम्ल के तीन अणुओं से मिलकर होता है। एडिनीन तथा राइबोज के अण्ड आपस में मिलकर एडिनोसिन बनते हैं जिसमें एक, दो या तीन फास्फेट समूह होते हैं जिसके परिणामस्वरूप एडीनी मीनो फास्फेट (A. M.P.) एडिनोसिन डाईफास्फेट (A.D.P.) तथा एडिनोसिन ट्राइफास्फेट (A.T.P.) बनाते है। A.T.P. के (अन्तिम फास्फेट समूह) A.D.P. के द्वारा बन्धित होता है यह बन्धन उच्च ऊर्जा बन्धक (High energy bound) के द्वारा होता है। जब अन्तिम फास्फेट समूह अर्थात् A.T.P. मुक्त होती है तो उसी के साथ 7000 कैलोरी की उच्च ऊर्जा मुक्त होती है।
A-P-P -----> AP-P+P+7000 कैलोरी

(A.T.P.) (A.D.P.) फास्फेट समूह 

माइटोकॉन्ड्रियान में भोजन के अवयवों का आक्सीकरण होने से उच्च मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती जिसका उपयोग (-P बाण्ड ) के रूप में किया जाता है इस प्रकार बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा संचित हो जाती है जिसका उपयोग श्वसन चक्र, न्यूक्लिक अम्ल के संश्लेषण, प्रोटीन संश्लेषण, तंत्रिका ।स्थानान्तरण तथा कोशा विभाजन आदि में किया जाता है।
Phosphate ADP फास्फेट
ऊर्जा---> ऊर्जा ------
HO ATP -----> H2O
में किया जा सकता है।

A.T.P.के अतिरिक्त अन्य अधिक ऊर्जा युक्त रासायनिक यौगिक होते हैं जो कोशीय उपाचय में सहायक होते हैं। जिनमें से यूरीडिन ट्राई फास्फेट (U.T.P.) साइटोसीन ट्राइफास्फेट (C.T.P.) तथा ग्वानोसीन ट्राइफास्फेट (G.T.P.) आदि प्रमुख यौगिक हैं। इन यौगिकों के द्वारा ATP से न्यूक्लियोसाइड डाइ-फास्फोकाइनेज एन्जाइम की उपस्थिति में ऊर्जा मुक्त होती है।

2. ऊर्जा संरक्षण (Energy Conservation)- कोशा श्वसन के समय ग्लूकोज के एक अणु का आक्सीकरण होता है जिसके परिणामस्वरूप 6 जोड़ी हाइड्रोजन आयन्स (12H) मुक्त होते ।। हाइड्रोजन आयन्स इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण श्रृंखला के अन्तर्गत गति करते हैं तथा प्रोटीन श्रृंखला का निर्माण करते हैं। इस श्रृंखला में आक्सीकरण-अपचयन समूह, चार काम्पलेक्स सह एन्जाइम्स तथा साइटोक्रोम्स होते हैं।

जब हाइड्रोजन समूह इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण श्रृंखला के अन्तर्गत गति करता है तो ADP, आक्सीकरण फास्फोराइलेशन (Oxidative Phosphorylation) होता है और प्रत्येक जोड़ी हाइड्रोजन समूह 3ATP अणुओं (2H = 3ATP) का निर्माण होता है।

3. योक का निर्माण (Yolk formation) - अण्डाणु के वर्धन के समय माइटोकॉन्ड्रिया के द्वारा योक का निर्माण होता है जिससे माइटोकॉन्ड्रिया की संरचना में निम्न परिवर्तन हो जाते हैं
(A) क्रिस्टी का संगठन अनियमित हो जाता है।
(B) मैट्रिक्स में कणिकाओं का निर्माण हो जाता है जो आपस में मिलकर बड़ी गोलाकार स्वर बनाते हैं।
(C) अन्त में माइटोकॉन्ड्रिया योक संचय अंगक (Yolk storing body) में परिवर्तित हो जाता है

4. स्रावण (Secretion) - हार्नबर्ग (Hornberg) ने माइटोकॉन्ड्रिया में जाइमोजेन कणिकाओं के सम्बन्ध को बनाता। उनके अनुसार इन कणिकाओं में अनेक प्रोटियोलाइटिक एन्जाइम्स होते हैं। इन एन्जाइम की क्रिया से लाइटिक तथा संश्लेषण की क्रियायें पूर्ण होती हैं।

5. कन्फार्मेशन कप्लिंग परिकल्पना (Conformational coupling hypothesis) - इस परिकल्पना के अनुसार माइटोकान्ड्रिया की आन्तरिक झिल्ली पर रिपीटिंग इकाइयाँ (repeatingunits) पायी जाती है तथा उनके वृन्त में संकुचन होता है तथा इनका शीर्ष भाग चपटा होकर डिस्क के आकार की संरचना बनाता है। जब माइटोकान्ड्रिया ऊर्जा विहीन (non-energytic) अवस्था में होता है, परन्तु इसके विपरीत ऊर्जा युक्त अवस्था में इसका वृन्त फैल जाता है तथा शीर्ष भाग वेसीकुलर हो जाता है। इस प्रकार की रिपीटिंग इकाइयाँ (Dumbell) के आकार की होती हैं। इस प्रकार यह चक्र हमेशा चलता रहता है तथा जब कोशिका को (A.T.P. संश्लेषण के लिए) ऊर्जा की आवश्यकता होती है तो ऊन युक्त अवस्था परिवर्तित हो जाती है जिसके परिणामस्वरूप ATP के रूप में ऊर्जा मुक्त होती है।

6.शुक्राणु वर्धन के समय माइटोकॉन्ड्रियल सर्पिल के निर्माण (Formation of mitochondrial spiral in developing sperm) - स्परमैटिड के शुक्राणु में रूपान्तरण के समय माइटोकान्द्रिया शुक्राणु के मध्य भाग में स्थित अक्षीय तन्तु के चारो तरफ माइटोकान्ड्रियल सर्पिल (Mitochondnal spiral) का निर्माण करते हैं। यह प्रक्रिया कीटों में आसानी से देखी जा सकती है जिसमें सभी माइटीकान्ड्रिया आपस में मिलकर एक काय (Compact body) बनाते हैं। इस संरचना को नेबेन्कन (Nebenkern) कहते हैं।

7. प्रोटियोलाइटिक प्रक्रिया (Proteolytic activity)- हार्निंग (Horning) ने बताया कि माइटोकान्ड्रिया मे प्रोटियोलाइटिक क्रियायें होती हैं उनके अनुसार माइटोकॉन्ड्रिया के द्वारा प्रोटोजोआ जन्तु (अमीबा में, लाइटिक तथा संश्लेषित दोनों ही क्रियायें होती हैं। जिसमें अमीबा में भोजन के अवयव छोट-छोट टुकड़ों के रुप में रुप में कोशाद्रव्य में परिभ्रमण करते है तथा बाद में माइटोकान्डिया से सम्बन्धित हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त अग्नाशय के द्वारा जाइमोजेन कणिकाओं का निर्माण भी
के द्वारा होता है।

8.हिस्टोजिनेसिस (Histogenesis) - लेवीकेवरेमान्ट (Levi-Cheveremont) के अनुसार मायोतन्तु (Myofibres) वास्तव में माइटोकॉन्ड्रियल अंगक है उनके अनुसार माइटोकान्ड्रिया के द्वारा हिस्टोजिनेसिस होती है अर्थात् न्यूरोफाइबिल्स तथा पेशीय तन्तु का निर्माण होता है।

9. वसा का उपापचय (Fat Metabolism) - वाटन (Wotton) ने सर्वप्रथम बताया कि माइटोकॉन्ड्रिया के द्वारा वसा का उपापचय होता है। बेन्सले (Bensley 1947) ने यकृत कोशिकाओं में स्थित माइटोकान्ड्रिया का अध्ययन किया और बताया कि इनमें उपापचयी पदार्थ संचित होते हैं।

10. जर्म कोशिकाओं का निर्माण (Formation of germ cells) - माइटोकान्ड्रिया के द्वारा जर्म कोशिकाओं का निर्माण होता है इस प्रक्रिया को कान्ड्रिया काइनेसिस (Chondriokinesis) कहते है।

11. अनुवांशिक कार्य (Hereditary function)- लक (Luck) तथा अन्य वैज्ञानिकों ने 1964 में बताया कि माइटोकॉन्ड्रिया, साइटोप्लाज्मिक जीन्स की तरह कार्य करते हैं। जो अनुवांशिक लक्षणों के वाहक होते हैं तथा जन्तुओं में अनुवांशिक सततीकरण बनाये रखते हैं।


इन्हें भी देखें-


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